Gurudev Sri Sri Ravi Shankar on Parenting: बच्चों की परवरिश को लेकर क्या कहते हैं गुरुदेव

गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर ने बच्चों की परवरिश को लेकर अनुशासन और समझ के संतुलन पर जोर दिया और माता-पिता को व्यावहारिक सलाह दी

Gurudev Sri Sri Ravi Shankar on Parenting: बच्चों की परवरिश को लेकर क्या कहते हैं गुरुदेव

आज के समय में बच्चों की परवरिश केवल देखभाल तक सीमित नहीं रह गई है   ध्यान भटकाव  मानसिक दबाव और किशोरावस्था से जुड़ी चुनौतियां माता-पिता के सामने नए प्रश्न खड़े कर रही हैं

  इसी विषय पर आध्यात्मिक गुरु गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर ने हाल ही में अपने विचार साझा किए  जिनमें उन्होंने बच्चों को समझने और मार्गदर्शन देने की एक संतुलित दृष्टि पर जोर दिया  

उन्होंने अपने संबोधन में साफ किया कि बच्चों के साथ न तो अत्यधिक सख्ती कारगर होती है और न ही पूरी छूट देना सही दिशा देता है  

परवरिश को लेकर उन्होंने एक सहज उदाहरण के माध्यम से बात समझाई   उनके अनुसार  बच्चों का मार्गदर्शन एक वाद्य यंत्र की तार की तरह है   यदि वह बहुत ढीली हो  तो उससे कोई मधुर स्वर नहीं निकलता और यदि बहुत कस दी जाए  तो भी संगीत संभव नहीं होता  

उनका कहना था कि माता-पिता को इस संतुलन को समझना होगा   उन्होंने यह स्पष्ट किया कि बच्चों को पूरी तरह खुला छोड़ देना उन्हें भटकाव की ओर ले जा सकता है  जबकि जरूरत से ज्यादा नियंत्रण उन्हें भीतर से बंद कर सकता है  

बच्चों को सही दिशा देने के तरीकों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि परवरिश केवल आदेश देने का नाम नहीं है   उनके अनुसार  बच्चों के साथ संवाद में समझाइश  मनुहार और समय पर सावधानी बरतना जरूरी होता है  

उन्होंने यह भी कहा कि कभी-कभी माता-पिता को थोड़ा सख्त होना पड़ता है  लेकिन वह सख्ती डर पैदा करने के लिए नहीं  बल्कि सही परिणामों को समझाने के लिए होनी चाहिए   उनकी दृष्टि में यही वह कौशल है  जिससे युवा मनों को संभाला जा सकता है  

किशोरावस्था से जुड़े व्यवहार पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि इस उम्र में बच्चों के शरीर और मन में कई बदलाव होते हैं   हार्मोनल परिवर्तन के कारण उनके भाव तेज हो जाते हैं और वे अपने माता-पिता से दूरी महसूस करने लगते हैं  

उन्होंने कहा कि इस अवस्था में बच्चों के भीतर माता-पिता के लिए प्रेम बना रहता है  लेकिन साथ ही गुस्सा और असंतोष भी बढ़ जाता है   इसी कारण कई बार संवाद कठिन हो जाता है  

उनके अनुसार  ऐसे समय में बच्चों को अतिरिक्त ध्यान और धैर्य की जरूरत होती है  

इस विषय पर आगे बात करते हुए उन्होंने शिक्षकों की भूमिका को भी अहम बताया   उनका मानना है कि जब बच्चे माता-पिता से खुलकर बात नहीं कर पाते  तब शिक्षक मित्र की भूमिका निभा सकते हैं  

उन्होंने कहा कि यदि शिक्षक बच्चों से जुड़ाव बना पाएं  तो वे उन्हें गलत कदम उठाने से रोक सकते हैं और जीवन के कठिन दौर में सहारा बन सकते हैं   उनके अनुसार  यह प्रक्रिया तुरंत परिणाम नहीं देती  लेकिन समय के साथ सकारात्मक बदलाव जरूर लाती है  

अपने विचारों में उन्होंने मन और शरीर के रिश्ते को भी एक अलग दृष्टि से समझाया   उनका कहना था कि आमतौर पर लोग मानते हैं कि मन शरीर के भीतर होता है 

जबकि उनके अनुसार शरीर स्वयं मन के भीतर होता है  

उन्होंने इसे पानी के अलग-अलग रूपों के उदाहरण से समझाया   जैसे भाप  पानी और बर्फ एक ही तत्व के अलग रूप हैं  वैसे ही मन और शरीर भी एक ही चेतना के अलग स्तर हैं   उनके अनुसार  जो जितना सूक्ष्म है  वह उतना ही व्यापक है  भले ही वह दिखाई न दे  

आज के दौर में जब बच्चे लगातार स्क्रीन  प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के दबाव में हैं  उन्होंने जो बात कही  वह केवल आध्यात्मिक नहीं रह जाती   यह व्यावहारिक परवरिश से भी जुड़ जाती है  

उनकी सीख यह संकेत देती है कि बच्चों के व्यवहार को सुधारने से पहले उन्हें समझना जरूरी है   परवरिश एक सतत प्रक्रिया है  जिसमें धैर्य  संवाद और सही समय पर मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है  

गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर की सलाह यह याद दिलाती है कि बच्चों की परवरिश किसी तय फार्मूले से नहीं होती   इसमें संतुलन  संवेदनशीलता और समय के साथ बदलने की समझ जरूरी है  

उनके अनुसार  जब माता-पिता बच्चों को न तो बहुत कसकर पकड़ते हैं और न ही पूरी तरह छोड़ देते हैं  तब ही उनका विकास सही दिशा में होता है  

Disclaimer यह लेख गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर द्वारा सार्वजनिक रूप से साझा किए गए विचारों और वक्तव्यों के संदर्भ में तैयार किया गया है   यह सामग्री केवल सूचना और सामान्य मार्गदर्शन के उद्देश्य से प्रस्तुत है   कोई भी निर्णय व्यक्तिगत परिस्थिति और विवेक के आधार पर लिया जाना चाहिए  



First Published on: December 14, 2025 8:00 pm IST

About the Author: Suhani Chauhan

I am Suhani Chauhan, a Religion and Hindu Calendar researcher at Hinduifestival.com, specializing in Hindu festivals, Panchang, and tithi systems. I study classical scriptures, traditional Panchang methods, and astronomical principles to understand sacred timekeeping. My work explains how lunar and solar cycles shape religious dates and rituals across India. I aim to present Hindu calendar knowledge in a clear, accurate, and trustworthy way for modern reader