Premanand Ji Maharaj: छात्रों की गाली देने की आदत क्यों बन सकती है भविष्य के लिए घातक

प्रेमानंद महाराज ने छात्रों की गाली देने की बढ़ती आदत को गंभीर बताया है। उनके अनुसार यह स्वभाव और भविष्य दोनों को प्रभावित कर सकती है

Premanand Ji Maharaj: छात्रों की गाली देने की आदत क्यों बन सकती है भविष्य के लिए घातक

छात्र जीवन को अक्सर सीखने  समझने और स्वयं को गढ़ने का समय कहा जाता है   यही वह दौर होता है जब व्यक्ति की आदतें  व्यवहार और सोच धीरे-धीरे आकार लेने लगती हैं  

 इन्हीं आदतों का प्रभाव आगे चलकर पूरे जीवन में दिखाई देता है   ऐसे में यदि इसी अवस्था में कोई गलत आदत गहराई से बैठ जाए  तो उसका असर लंबे समय तक बना रहता है  

इसी विषय पर वृंदावन से जुड़े संत प्रेमानंद महाराज ने छात्रों के व्यवहार  विशेषकर गाली-गलौच और अभद्र भाषा के बढ़ते चलन पर गंभीर बात कही है   उन्होंने इसे केवल बोलचाल की आदत नहीं  बल्कि चरित्र से जुड़ा विषय बताया है  

आज स्कूल और कॉलेज के माहौल में यह आम देखने को मिल जाता है कि छात्र आपसी बातचीत में गालियों का प्रयोग करते हैं   कई बार मजाक में  कई बार गुस्से में और कई बार बिना किसी कारण के ही यह भाषा बोलचाल का हिस्सा बन जाती है  

उन्होंने इस प्रवृत्ति पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि जब कोई गलत व्यवहार बार-बार दोहराया जाता है  तो वह धीरे-धीरे सामान्य लगने लगता है   यही सबसे खतरनाक स्थिति होती है  क्योंकि तब व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि वह अपने स्वभाव को किस दिशा में ले जा रहा है  

उन्होंने स्पष्ट किया कि गाली देना कोई हल्की बात नहीं है   यह आदत मन की कठोरता को बढ़ाती है और धीरे-धीरे व्यक्ति के विचारों को भी अशुद्ध करने लगती है   शुरू में यह मजाक जैसा लग सकता है  लेकिन समय के साथ यह स्वभाव का हिस्सा बन जाती है  

उनका मानना है कि शब्द केवल आवाज नहीं होते  बल्कि वे मन की स्थिति को दर्शाते हैं   जब भाषा असंयमित होती है  तो व्यवहार भी उसी दिशा में जाने लगता है  

 यही कारण है कि यह आदत आगे चलकर संबंधों  करियर और सामाजिक छवि को नुकसान पहुंचा सकती है  

छात्र जीवन को लेकर उन्होंने एक गहरी बात कही   उनके अनुसार यह समय केवल पढ़ाई का नहीं  बल्कि आत्मनिर्माण का होता है   इस दौर में व्यक्ति अपने व्यवहार  विचार और अनुशासन पर काम करता है  

उन्होंने कहा कि जो छात्र इस समय गलत आदतों में उलझ जाता है  उसे आगे चलकर जीवन में अधिक संघर्ष करना पड़ता है   इसके विपरीत जो इस अवस्था में संयम  मर्यादा और अच्छे आचरण को अपनाता है  उसके लिए आगे का रास्ता अपेक्षाकृत सरल हो जाता है  

उन्होंने यह भी कहा कि ज्ञान अर्जन के समय मन और शरीर दोनों पर नियंत्रण जरूरी होता है   जब छात्र इस अवस्था में अपने व्यवहार को बिगाड़ने वाली आदतों में लिप्त हो जाते हैं  तो उनका ध्यान लक्ष्य से भटकने लगता है  

उनके अनुसार  अनुशासन का अर्थ कठोरता नहीं है  बल्कि स्वयं को सही दिशा में बनाए रखना है   भाषा की शुद्धता भी इसी अनुशासन का हिस्सा है  

उन्होंने यह बात भी इशारों में रखी कि यदि परिवार और समाज ऐसी आदतों को नजरअंदाज करता है  तो समस्या और गहरी हो जाती है   समय रहते समझाना  मार्गदर्शन देना और सही आदर्श प्रस्तुत करना जरूरी होता है  

उनका मानना है कि छात्र को डांट से नहीं  बल्कि स्पष्ट और दृढ़ समझाइश से सही दिशा दी जा सकती है  

आज जब सोशल मीडिया  डिजिटल कंटेंट और असंयमित भाषा चारों ओर मौजूद है  तब उनकी यह बात और भी प्रासंगिक हो जाती है   छात्रों के लिए यह समझना जरूरी है कि हर चलन अपनाने योग्य नहीं होता  

उन्होंने जो चेतावनी दी  वह डराने के लिए नहीं  बल्कि समय रहते सचेत करने के लिए है   भाषा  व्यवहार और आदतें ही भविष्य की नींव रखती हैं  

उन्होंने अपने विचारों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि छात्र जीवन में बोली जाने वाली भाषा केवल शब्द नहीं होती  बल्कि वही आगे चलकर व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिचय बनती है   गाली-गलौच जैसी आदतें क्षणिक मजाक लग सकती हैं  लेकिन उनका प्रभाव गहरा और स्थायी होता है  

उनकी सीख छात्रों को यह सोचने का अवसर देती है कि वे आज जो आदतें बना रहे हैं  वही कल उनका भविष्य तय करेंगी  

Disclaimer : यह लेख प्रेमानंद जी महाराज के सार्वजनिक प्रवचनों और विचारों के संदर्भ में तैयार किया गया है   यह सामग्री केवल सूचना और सामाजिक-आध्यात्मिक चिंतन के उद्देश्य से प्रस्तुत है



TOPICS Religion

First Published on: December 15, 2025 8:00 pm IST

About the Author: Suhani Chauhan

I am Suhani Chauhan, a Religion and Hindu Calendar researcher at Hinduifestival.com, specializing in Hindu festivals, Panchang, and tithi systems. I study classical scriptures, traditional Panchang methods, and astronomical principles to understand sacred timekeeping. My work explains how lunar and solar cycles shape religious dates and rituals across India. I aim to present Hindu calendar knowledge in a clear, accurate, and trustworthy way for modern reader