शुक्ल और कृष्ण पक्ष क्या हैं और हिंदू कैलेंडर में इनकी गणना कैसे की जाती है

शुक्ल और कृष्ण पक्ष हिंदू कैलेंडर में चंद्रमा के बढ़ने-घटने पर आधारित समय-खंड हैं। इनकी गणना तिथि और खगोलीय कोण से जुड़ी होती है

शुक्ल और कृष्ण पक्ष क्या हैं और हिंदू कैलेंडर में इनकी गणना कैसे की जाती है

हिंदू कैलेंडर में शुक्ल और कृष्ण पक्ष क्या हैं   और इनकी गणना वास्तव में कैसे समझी जाती है?

अक्सर जब शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की बात होती है  तो चर्चा सीधे शुभ और अशुभ पर आ टिकती है  शादी के लिए कौन-सा पक्ष सही है  किस पक्ष में नया काम शुरू नहीं करना चाहिए जैसे सवाल ज़्यादा सुनाई देते हैं 


लेकिन कम लोग यह पूछते हैं कि ये पक्ष बने क्यों  इनकी गणना किस आधार पर होती है  और क्या हर जगह इन्हें एक ही अर्थ में समझा जाता है 

हिंदू कैलेंडर में शुक्ल-कृष्ण पक्ष केवल धार्मिक धारणा नहीं हैं  ये समय को चंद्रमा के बदलते दृश्य रूप के साथ जोड़कर समझने की एक पुरानी प्रणाली का हिस्सा हैं जिसे पंचांग के माध्यम से पढ़ा जाता है 

आम बातचीत में पंचांग और हिंदू कैलेंडर को एक ही मान लिया जाता है  जबकि तकनीकी रूप से दोनों की भूमिका अलग है
 

कैलेंडर हमें महीना और तारीख का ढांचा देता है  पंचांग उस दिन की खगोलीय स्थिति बताता है 

पंचांग के पाँच अंग माने जाते हैं तिथि  वार  नक्षत्र  योग और करण  यही कारण है कि एक ही अंग्रेज़ी तारीख अलग-अलग स्थानों के पंचांग में अलग तिथि दिखा सकती है  गणना सूर्योदय और स्थानीय खगोलीय स्थिति पर आधारित होती है  न कि केवल तारीख पर 

यहीं से शुक्ल और कृष्ण पक्ष की समझ शुरू होती है 

पक्ष का अर्थ महीना नहीं है  बल्कि महीने के भीतर चंद्र चक्र का आधा हिस्सा 

हिंदू चंद्र मास को परंपरा में दो हिस्सों में देखा जाता है 

  • शुक्ल पक्ष: जब चंद्रमा का प्रकाश बढ़ता हुआ दिखाई देता है
  • कृष्ण पक्ष: जब चंद्रमा का प्रकाश घटता हुआ दिखाई देता है

यह विभाजन चंद्रमा के दिखने से जुड़ा है  लेकिन गणना केवल दृश्यता पर आधारित नहीं होती  इसका आधार सूर्य और चंद्रमा के बीच का कोणीय अंतर होता है 

कृष्ण पक्ष उस अवधि को कहा जाता है जब पूर्णिमा के बाद चंद्रमा धीरे-धीरे घटते हुए अमावस्या की ओर जाता है 

  • शुरुआत: पूर्णिमा के बाद आने वाली प्रतिपदा से
  • समाप्ति: अमावस्या पर

लोकधारणा में कृष्ण पक्ष को कई मांगलिक कार्यों के लिए कम अनुकूल कहा जाता है  इसका एक कारण यह माना जाता है कि चंद्रमा को मन और भाव-जगत से जोड़ा गया है  इसलिए  घटता चंद्र  कुछ परंपराओं में घटती ऊर्जा  का प्रतीक बन गया 

लेकिन व्यवहार में तस्वीर इतनी सीधी नहीं है  कई परंपराओं में कृष्ण पक्ष को तप  साधना  आत्ममंथन और पितृ-स्मरण से जोड़ा जाता है  यानी  कम शुभ  कहना एक लोकप्रिय व्याख्या है  कोई सार्वभौमिक नियम नहीं 

शुक्ल पक्ष वह समय माना जाता है जब अमावस्या के बाद चंद्रमा बढ़ते-बढ़ते पूर्णिमा की ओर जाता है।

  • शुरुआत: अमावस्या के बाद प्रतिपदा से
  • समाप्ति: पूर्णिमा पर

लोकप्रचलन में शुक्ल पक्ष को शुरुआत और वृद्धि से जोड़ा जाता है। बढ़ता चंद्रमा समाज में उन्नति और विस्तार का प्रतीक बन गया। 

इसी वजह से विवाह  गृहप्रवेश या नामकरण जैसे संदर्भों में शुक्ल पक्ष का उल्लेख अधिक सुनाई देता है।

हालाँकि पंचांग की दृष्टि से कोई भी निर्णय केवल पक्ष देखकर नहीं लिया जाता  तिथि  नक्षत्र  योग  करण और वार सभी को साथ देखकर मुहूर्त तय किया जाता है 

अक्सर लोग मान लेते हैं कि हर पक्ष 15 दिन का होता है यहीं सबसे बड़ा भ्रम पैदा होता है 

असल में तिथि दिन नहीं  एक खगोलीय इकाई है जब सूर्य और चंद्रमा के बीच कोणीय दूरी 12 डिग्री बढ़ जाती है  तब एक तिथि पूरी मानी जाती है 

इस तरह कुल 30 तिथियाँ बनती हैं 15 शुक्ल पक्ष में और 15 कृष्ण पक्ष में
लेकिन एक तिथि का 24 घंटे का होना जरूरी नहीं  वह कम समय की भी हो सकती है और ज़्यादा की भी  इसी वजह से कभी-कभी एक ही दिन में तिथि बदल जाती है या पंचांग में तिथि क्षय जैसी स्थिति दिखाई देती है 

पक्ष की संरचना स्थिर रहती है  लेकिन तिथियों की लंबाई स्थिर नहीं होती यह बात अक्सर समझ में नहीं आ पाती 

धार्मिक मान्यताओं में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है इसी वजह से उसके बढ़ने-घटने को भावनात्मक भाषा में समझाया जाता रहा
कुछ विद्वान इसे भारतीय समाज की प्रकृति-आधारित जीवनशैली से जोड़कर देखते हैं जहाँ खेती  यात्रा  रात की रोशनी  नींद और मौसम चंद्र-प्रकाश से प्रभावित अनुभवों का हिस्सा रहे हैं 

इस दृष्टि से शुक्ल और कृष्ण पक्ष केवल पूजा-संबंधी शब्द नहीं  बल्कि समय को पढ़ने की एक सांस्कृतिक भाषा हैं 

पुराणों और लोककथाओं में चंद्रमा से जुड़ी कई कथाएँ मिलती हैं  ये कथाएँ समाज को अर्थ समझाने का एक तरीका रही हैं लेकिन इन कथाओं को खगोलीय गणना का प्रमाण मानना ठीक नहीं 

एक जिम्मेदार संपादकीय दृष्टि में कथा को धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ में और गणना को ज्योतिषीय-खगोलीय सिद्धांत के रूप में देखना ज़्यादा स्पष्टता देता है  

दोनों साथ चल सकते हैं  लेकिन एक दूसरे का स्थान नहीं ले सकते 

भारत में चंद्र मास की गणना की दो परंपराएँ मिलती हैं 

  • अमांत प्रणाली: जहाँ महीना अमावस्या पर समाप्त माना जाता है
  • पूर्णिमांत प्रणाली: जहाँ महीना पूर्णिमा पर समाप्त माना जाता है

इसी वजह से कई बार एक ही महीने का नाम अलग क्षेत्रों में अलग समय पर चलता हुआ दिखता है  यह पक्षों की गणना का नहीं  बल्कि महीने की सीमा तय करने का अंतर है  शुक्ल और कृष्ण पक्ष दोनों प्रणालियों में रहते हैं 

शुक्ल और कृष्ण पक्ष को केवल शुभ-अशुभ के खांचे में रखना अक्सर अधूरी समझ देता है
 

ये चंद्र-चक्र को भाषा देने का एक तरीका हैं  जिस पर समाज ने अपने अनुभव  संस्कार और धार्मिक व्याख्याएँ जोड़ दीं 

इसीलिए कहीं शुक्ल पक्ष शुरुआत का संकेत बन जाता है  तो कहीं कृष्ण पक्ष आत्ममंथन और विराम का 


हिंदू कैलेंडर की विशेषता यही है कि वह समय को स्थिर तारीख नहीं  बल्कि बदलती हुई प्रकृति के रूप में देखने की कोशिश करता है 



TOPICS Religion

First Published on: December 31, 2025 9:02 am IST

About the Author: Ritika Rawal

I am Ritika Rawal, a ground-level religious writer exploring Gods, Aarti traditions, Horoscope, Panchang and temple culture. I work closely with local pandits and experienced astrologers, bringing their real insights to readers. My focus is pure, authentic spiritual reporting that connects rituals with everyday faith.