शाम को झाड़ू लगाना वर्जित क्यों माना गया है ? जानें इसके पीछे का धार्मिक वास्तु और व्यवहारिक कारण

संध्या के समय झाड़ू लगाना क्यों वर्जित माना गया है? जानिए शास्त्र, वास्तु और अनुभवों के आधार पर इसके पीछे छिपा गहरा कारण।

शाम को झाड़ू लगाना वर्जित क्यों माना गया है ? जानें इसके पीछे का धार्मिक  वास्तु और व्यवहारिक कारण

भारतीय सनातन संस्कृति में अनेक आचार-विचार हैं जो केवल नियम नहीं   बल्कि अनुभूत ज्ञान और आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतिबिंब हैं   उन्हीं में से एक है    संध्या काल में झाड़ू न लगाना  

बचपन से हम सबने अपने घर के बुजुर्गों को कहते सुना है  

“सूर्यास्त के बाद झाड़ू मत लगाओ   लक्ष्मी रूठ जाती हैं  “

परंतु क्या यह केवल आस्था है? या इसके पीछे कोई वेदोक्त   व्यवहारिक एवं ऊर्जा वैज्ञानिक तर्क भी है?

इस लेख में हम इस मान्यता का विश्लेषण करेंगे धर्मशास्त्र   वास्तु सिद्धांत   मनोविज्ञान और आधुनिक जीवनशैली के परिप्रेक्ष्य से  

ऋग्वेद तथा पद्मपुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में माता लक्ष्मी को स्वच्छता   सौंदर्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी माना गया है  

“स्वच्छता जहां   लक्ष्मी वहां  “

झाड़ू को भी शास्त्रों में लक्ष्मी का प्रतीक कहा गया है   क्योंकि यह घर से अशुद्धता   रज-तम और क्लेश को हटाता है   अतः जब कोई साधक सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाता है   तो यह ऐसा आचरण हो जाता है जैसे व्यक्ति स्वयं लक्ष्मी को घर से निष्कासित कर रहा हो  

“संध्याकाल” को देवी-देवताओं के आगमन का समय माना गया है   इस वेला में घर में दीप प्रज्वलन   स्तोत्र-पाठ और ध्यान की परंपरा है   ऐसे में झाड़ू लगाने से पवित्रता का ह्रास और दैवीय ऊर्जा का विघटन हो सकता है    यही भाव इस निषेध के मूल में है  

वास्तु शास्त्र के अनुसार   दिन को चार प्रहरों में विभाजित किया गया है   

  1. प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त से सूर्योदय तक)
  2. मध्यान्ह (दोपहर तक)
  3. सायं काल (सूर्यास्त के पश्चात)
  4. रात्रि काल (अंधकार काल)

वास्तु सूत्रों में प्रातःकाल या मध्यान्ह को शौचाचार   स्वच्छता और गृहकार्य हेतु उपयुक्त बताया गया है  

“सायं समयः ध्यानाय   न स्वच्छताय  “

संध्या वेला में घर की ऊर्जा स्थिर होती है   इस समय झाड़ू लगाने से घर की एकत्रित सकारात्मक ऊर्जा विक्षिप्त हो सकती है   इसलिए   परंपरा में इसे दरिद्रता का कारण माना गया है  

प्राचीन भारत में जब कृत्रिम रोशनी का प्रचलन नहीं था   तब लोग दीपक   मशाल या लालटेन के सहारे ही कार्य करते थे   यदि किसी के आभूषण   सिक्के या अन्य छोटी वस्तुएं गिर जातीं और उस समय झाड़ू लगा दी जाती   तो वे वस्तुएं बाहर फेंकी जा सकती थीं  

इसलिए घर के संचालकों ने यह नीति बनाई कि संध्या के बाद झाड़ू न लगाई जाए    ताकि कोई अनजानी हानि न हो  

प्राण ऊर्जा (life force) की अवधारणा आयुर्वेद   योग और वास्तु में विशेष महत्व रखती है   जब आप दिनभर घर को स्वच्छ और शांत रखते हैं   तो घर में सत्वगुणीय ऊर्जा संचित होती है  

“झाड़ू केवल धूल नहीं हटाता   यह ऊर्जा की दिशा भी बदलता है  “

यदि आप सूर्यास्त के बाद झाड़ू लगाते हैं   तो वह ऊर्जा के स्थायित्व को तोड़ देता है   यही कारण है कि ऐसी मान्यता बनी कि झाड़ू लक्ष्मी को बाहर कर देता है  

संध्या समय भारतीय जीवन में हमेशा से ध्यान   संध्या वंदन   संकीर्तन और विश्राम का समय माना गया है  

यदि आप इस समय सफाई जैसे क्रियाकलाप करते हैं   तो आपका मन विश्राम की बजाय व्यस्तता में उलझा रहेगा   धीरे-धीरे यह थकावट   चिड़चिड़ापन और मानसिक उथल-पुथल को जन्म देता है  

“संध्या का अर्थ है  रुक जाना   अपने भीतर लौट आना  “

झाड़ू जैसे क्रियाकलाप इस आंतरिक प्रवाह को बाधित करते हैं  

आज के युग में जब 24×7 रोशनी और व्यस्तता सामान्य है   तब यह प्रश्न उठता है कि क्या यह नियम आज भी उतना ही प्रासंगिक है?

उत्तर है    प्रासंगिक है   यदि विवेक से अपनाया जाए  

  • यदि बहुत ज़्यादा गंदगी हो तो कोमल और सीमित सफाई की जा सकती है 
  • संध्या दीप प्रज्वलन या लक्ष्मी पूजन से ठीक पहले झाड़ू लगाने से बचें 
  • घर में यदि छोटे बच्चे या पालतू जानवर हों तो पूरे दिन सफाई स्वाभाविक है    बस इस प्रक्रिया को धार्मिक समय से अलग रखें 

शाम को झाड़ू न लगाने की परंपरा केवल अंधविश्वास नहीं है   यह एक सांस्कृतिक अनुशासन   ऊर्जा विज्ञान   और आध्यात्मिक विचार का समन्वय है  

जब कोई परंपरा युगों से जीवित है   तो उसमें केवल डर नहीं   अनुभव छिपा होता है  

यदि हम अपने जीवन में इस परंपरा को शुद्ध भाव   समयबद्धता और थोड़े विवेक के साथ अपनाएं   तो यह केवल लक्ष्मी को प्रसन्न ही नहीं   बल्कि मानसिक संतुलन और पारिवारिक अनुशासन को भी मज़बूत करती है  



TOPICS Religion Vastu

First Published on: December 8, 2025 8:55 pm IST

About the Author: Ritika Rawal

I am Ritika Rawal, a ground-level religious writer exploring Gods, Aarti traditions, Horoscope, Panchang and temple culture. I work closely with local pandits and experienced astrologers, bringing their real insights to readers. My focus is pure, authentic spiritual reporting that connects rituals with everyday faith.