Pradosh Vrat 2026: पंचांग के अनुसार जनवरी में आखिरी प्रदोष व्रत 30 या 31 जनवरी क्या है सही तिथि?
जनवरी 2026 का आखिरी प्रदोष व्रत 30 या 31 तारीख को कब है? पंचांग के अनुसार सही तिथि, मुहूर्त और पूजा विधि जानें

जनवरी 2026 के अंत में आने वाले प्रदोष व्रत को लेकर सबसे अधिक भ्रम इसी बात को लेकर है कि यह व्रत 30 जनवरी को रखा जाएगा या 31 जनवरी को।
कैलेंडर में अलग-अलग तिथियाँ दिखने की वजह से यह सवाल स्वाभाविक हैलेकिन प्रदोष व्रत की तिथि अंग्रेज़ी तारीख़ से नहीं बल्कि पंचांग की त्रयोदशी तिथि से तय होती है।
इसी कारण सही उत्तर जानने के लिए पंचांग आधारित गणना को समझना ज़रूरी हो जाता है।
Pradosh Vrat 2026 Kab Hai: पंचांग के अनुसार सही तिथि
पंचांग के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 30 जनवरी 2026 को सुबह 11 बजकर 09 मिनट पर आरंभ होती है और 31 जनवरी 2026 को सुबह 08 बजकर 25 मिनट तक रहती है।
हिंदू परंपरा में व्रत और पूजा की तिथि सूर्योदय के आधार पर मानी जाती है। चूँकि त्रयोदशी तिथि 30 जनवरी को सूर्योदय के बाद शुरू हो रही हैइसलिए जनवरी महीने का अंतिम प्रदोष व्रत 30 जनवरी 2026 को ही रखा जाएगा।
यह प्रदोष व्रत शुक्रवार को पड़ने के कारण शुक्र प्रदोष व्रत कहलाएगा।
प्रदोष व्रत का प्रदोष काल कब रहेगा
प्रदोष व्रत की पूजा का सबसे महत्वपूर्ण समय प्रदोष काल माना जाता है। यह काल सूर्यास्त के आसपास का होता है और इसी समय शिव पूजा को विशेष फलदायी माना गया है।
30 जनवरी 2026 को प्रदोष काल सायंकाल 05 बजकर 52 मिनट से आरंभ होकर रात 08 बजकर 26 मिनट तक रहेगा।
इस प्रकार शिव भक्तों को प्रदोष काल में पूजा करने के लिए लगभग ढाई घंटे का शुभ समय प्राप्त होगा।
प्रदोष व्रत क्यों माना जाता है विशेष
सनातन परंपरा में भगवान शिव को सहजकरुणामय और शीघ्र प्रसन्न होने वाला देव माना गया है।
यही कारण है कि त्रयोदशी तिथिजो शिव पूजा के लिए समर्पित मानी जाती हैअत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
प्रत्येक मास में शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को आने वाला प्रदोष व्रत शिव और शक्ति दोनों की उपासना का अवसर देता है।
मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा साधक के जीवन में स्थिरताशांति और संतुलन लाती है।
प्रदोष व्रत की पूजा कैसे करें
प्रदोष व्रत के दिन साधक को सुबह से ही संयम और श्रद्धा के साथ दिन की शुरुआत करनी चाहिए।
पूरे दिन सात्त्विक भोजन और विचारों का पालन करना शुभ माना जाता है।
प्रदोष काल से पहले पूजा की सभी सामग्री एकत्रित कर लेनी चाहिए।
पूजा के समय सबसे पहले शुद्ध जल या गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करें।
इसके बाद दीपधूपपुष्पबेलपत्र और भस्म अर्पित करें।
पूजा के दौरान प्रदोष व्रत की कथा का श्रवण या पाठ किया जाता है।
अंत में विधि-विधान से आरती कर भगवान शिव से मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना की जाती है।
पूजा के बाद प्रसाद का वितरण करना और स्वयं ग्रहण करना भी परंपरा का हिस्सा है।
शुक्र प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
शुक्रवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत विशेष माना जाता है क्योंकि यह दिन सुखसौंदर्य और वैवाहिक जीवन से जुड़ा माना जाता है।
मान्यता है कि शुक्र प्रदोष व्रत का विधिपूर्वक पालन करने से पारिवारिक तनावमानसिक अशांति और जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं।
धार्मिक दृष्टि से यह व्रत यशकीर्ति और स्थिर जीवन की प्राप्ति का माध्यम माना गया है।
इसी कारण कई श्रद्धालु इसे नियमित रूप से रखने का संकल्प करते हैं।
30 या 31 जनवरी का भ्रम क्यों होता है
अक्सर अंग्रेज़ी कैलेंडर देखने पर लोग तिथि को रात बारह बजे से जोड़ लेते हैंजबकि पंचांग में तिथि चंद्रमा की गति पर आधारित होती है।
यही अंतर भ्रम का मुख्य कारण बनता है।
प्रदोष व्रत जैसे पर्वों में तिथि का निर्णय पंचांग और उदय तिथि प्रणाली से किया जाता हैन कि कैलेंडर की तारीख़ से।
जनवरी 2026 का अंतिम प्रदोष व्रत 30 जनवरी 2026शुक्रवार को रखा जाएगा।
इस दिन प्रदोष काल में की गई पूजा धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विशेष फल प्रदान करने वाली मानी जाती है।
प्रदोष व्रत न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान हैबल्कि आत्मसंयमश्रद्धा और आंतरिक संतुलन का अभ्यास भी है।
डिस्क्लेमर :यह लेख पंचांग आधारित गणनाशास्त्रीय परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। तिथि और मुहूर्त में क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार अंतर संभव है।
Hinduifestival.com पाठकों को सलाह देता है कि किसी भी व्रत से पहले अपने स्थानीय पंचांग की पुष्टि अवश्य करें।
First Published on: January 24, 2026 10:29 am IST




