Ravi Pradosh Vrat 2026: क्या 1 मार्च है उपवास का दिन? जानें पूजा का सही समय और तिथि

Ravi Pradosh Vrat 2026 1 मार्च रविवार को रखा जाएगा। यह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि में पड़ रहा है। प्रदोष व्रत भगवान शिव की संध्या पूजा से जुड़ा होता है और इसका मुख्य समय सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल माना जाता है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त लगभग शाम 06:21 से 07:09 बजे तक रहेगा जब त्रयोदशी तिथि विद्यमान होगी। जो लोग उपवास रखते हैं वे सुबह संकल्प लेकर शाम को शिव पूजा करते हैं। मान्यता है कि रवि प्रदोष व्रत आत्मबल शांति और जीवन में संतुलन के लिए विशेष माना जाता है।

Ravi Pradosh Vrat 2026 date time upvas day and puja muhurat as per Panchang
Ravi Pradosh Vrat 2026 date time upvas day and puja muhurat as per Panchang

रविवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत अक्सर लोगों के लिए आसान माना जाता है क्योंकि उस दिन काम का दबाव कम रहता है और शाम को पूजा करने का समय मिल जाता है। मार्च की शुरुआत में आने वाला रवि प्रदोष 1 मार्च 2026 को पड़ रहा है और बहुत से लोग पहले से जानना चाहते हैं  प्रदोष व्रत कब है पूजा का सही मुहूर्त क्या है त्रयोदशी तिथि कब तक रहेगी और व्रत कैसे करें।

यह व्रत पूरे दिन से ज्यादा सूर्यास्त के बाद के समय पर आधारित होता है इसलिए सही समय जानना सबसे जरूरी माना जाता है।

रवि प्रदोष व्रत 1 मार्च 2026 रविवार को रखा जाएगा। यह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि में पड़ रहा है। प्रदोष व्रत हर महीने दो बार आता है लेकिन जब यह रविवार को पड़ता है तो इसे रवि प्रदोष कहा जाता है।

जानकारीसमय
रवि प्रदोष व्रत तारीख1 मार्च 2026 रविवार
प्रदोष पूजा मुहूर्तशाम 06:21 से 07:09 बजे तक
मुहूर्त की अवधि48 मिनट
प्रदोष कालशाम 06:21 से 08:50 बजे तक
त्रयोदशी तिथि शुरू28 फरवरी 2026 रात 08:43 बजे
त्रयोदशी तिथि समाप्त1 मार्च 2026 शाम 07:09 बजे

प्रदोष व्रत भगवान शिव की उपासना से जुड़ा मासिक व्रत है। इसे त्रयोदशी तिथि की संध्या में किया जाता है। मान्यता है कि इस समय शिव पूजा करने से मानसिक शांति स्वास्थ्य और जीवन में संतुलन प्राप्त होता है।

यह व्रत खास इसलिए भी माना जाता है क्योंकि यह दिन नहीं बल्कि समय आधारित व्रत है। सूर्यास्त के बाद का सीमित समय ही इसकी मुख्य अवधि होता है।

जब प्रदोष रविवार को पड़ता है तो उसे रवि प्रदोष कहा जाता है। रविवार सूर्य का दिन माना जाता है इसलिए इस दिन के प्रदोष को आत्मबल प्रतिष्ठा और नेतृत्व क्षमता से जोड़कर देखा जाता है।

कुछ परंपराओं में इसे पितृ शांति और सूर्य से जुड़े दोषों के निवारण से भी जोड़ा जाता है हालांकि मान्यताएँ क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती हैं।

सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है
दिन भर संयम रखा जाता है
सूर्यास्त के बाद शिव पूजा की जाती है
दीपक जलाकर मंत्र जप या आरती की जाती है

कुछ लोग फलाहार करते हैं जबकि कुछ निर्जल व्रत भी रखते हैं। यह पूरी तरह व्यक्तिगत परंपरा पर निर्भर करता है।

पंचांग के अनुसार प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद का वह समय होता है जब दिन और रात का संक्रमण चलता है। खगोलीय दृष्टि से यह समय संतुलन का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण शिव आराधना के लिए इसे विशेष माना गया है।

पुराने समय में इसी समय घरों में दीप जलाने की परंपरा थी। धार्मिक कारणों के साथ-साथ यह व्यावहारिक भी था क्योंकि अंधेरा होने से पहले घर में रोशनी सुनिश्चित हो जाती थी।

जो लोग नियमित रूप से प्रदोष व्रत करते हैं उनके लिए यह मासिक साधना का हिस्सा होता है। लेकिन कई लोग विशेष मनोकामना या जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय से पहले भी यह व्रत रखते हैं।

रविवार को होने के कारण यह व्रत उन लोगों के लिए भी आसान हो जाता है जो सप्ताह के अन्य दिनों में व्यस्त रहते हैं।

कभी-कभी लगता है कि इस व्रत का वास्तविक अर्थ पूजा से ज्यादा उस प्रतीक्षा में है जो पूरे दिन चलती रहती है  सूर्यास्त का इंतजार दीप जलने का इंतजार और उस थोड़ी-सी शांति का इंतजार जो शाम के साथ आती है


TOPICS 2026 Hindu Festival

First Published on: February 25, 2026 5:54 pm IST

About the Author: Ritika Rawal

I am Ritika Rawal, a ground-level religious writer exploring Gods, Aarti traditions, Horoscope, Panchang and temple culture. I work closely with local pandits and experienced astrologers, bringing their real insights to readers. My focus is pure, authentic spiritual reporting that connects rituals with everyday faith.