जब हिंदू कैलेंडर में पहले से 12 मास हैं तो अधिक मास क्यों जोड़ा जाता है?
हिंदू कैलेंडर में अधिक मास क्यों आता है? 12 मास होने के बावजूद यह अतिरिक्त महीना क्यों जोड़ा जाता है इसके पीछे का वैज्ञानिक संतुलन जानिए

हिंदू कैलेंडर में 12 मास होने के बाद अधिक मास क्यों आता है
पंचांग देखते समय अक्सर यह उल्लेख मिलता है कि किसी वर्ष अधिक मास है और इस कारण विवाह मुंडन या कुछ अन्य शुभ कार्य नहीं किए जाएंगे। सामान्य रूप से यह प्रश्न उठता है कि जब हिंदू कैलेंडर में पहले से ही 12 महीने माने जाते हैं
तो फिर यह अतिरिक्त महीना क्यों जोड़ा जाता है। क्या यह केवल धार्मिक परंपरा है या इसके पीछे कोई ठोस खगोलीय और गणितीय आधार भी है।
इस प्रश्न का उत्तर हिंदू कैलेंडर की मूल संरचना को समझे बिना स्पष्ट नहीं हो सकता।
हिंदू कैलेंडर की चंद्र–सौर संरचना
हिंदू पंचांग की विशेषता यह है कि यह केवल चंद्रमा या केवल सूर्य पर आधारित नहीं है। इसमें चंद्रमा की गति से तिथि पक्ष और मास तय किए जाते हैं जबकि सूर्य की गति से ऋतु और वर्ष का संतुलन बनाया जाता है। इसी संतुलन को हिंदू कैलेंडर की चंद्र–सौर संरचना कहा जाता है।
यहीं से अधिक मास की आवश्यकता की पृष्ठभूमि बनती है।
चंद्र मास और सौर वर्ष का अंतर
चंद्र मास वह अवधि है जिसमें चंद्रमा एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक का चक्र पूरा करता है। इसकी औसत अवधि लगभग 29.5 दिन होती है। ऐसे 12 चंद्र मास मिलकर लगभग 354 दिन बनाते हैं।
इसके विपरीत सौर वर्ष जो सूर्य की प्रतीत होने वाली वार्षिक गति पर आधारित होता है लगभग 365 दिन का होता है।
अर्थात हर वर्ष चंद्र गणना और सौर गणना के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर उत्पन्न हो जाता है। यदि इस अंतर को समायोजित न किया जाए तो कुछ ही वर्षों में त्योहार और ऋतुएं अपने प्राकृतिक समय से हटने लगेंगी।
यही चंद्र मास और सौर वर्ष का अंतर हिंदू कालगणना की सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती है।
केवल 12 मास मानने से क्या समस्या आती है
यदि हर वर्ष केवल 12 चंद्र मास ही स्वीकार किए जाएं तो समय के साथ धार्मिक पर्व और मौसमी चक्र पूरी तरह असंतुलित हो जाएंगे।
होली जैसी वसंत ऋतु की परंपराएं ग्रीष्म में और दीपावली वर्षा ऋतु में आने लगेंगी।
कृषि मौसम और धार्मिक अनुष्ठानों का आपसी तालमेल टूट जाएगा। इसी स्थिति से बचने के लिए हिंदू पंचांग में एक समायोजन तंत्र विकसित किया गया।
अधिक मास क्या है और यह कब जोड़ा जाता है
अधिक मास उस अतिरिक्त चंद्र मास को कहा जाता है जो तब आता है जब किसी चंद्र मास की पूरी अवधि के दौरान सूर्य एक भी राशि परिवर्तन संक्रांति नहीं करता।
सरल शब्दों में कहा जाए तो जब सूर्य एक ही राशि में रहते हुए दो अमावस्याओं के बीच फंसा रहता है तब उस पूरे चंद्र मास को अधिक मास माना जाता है। यह व्यवस्था लगभग हर 32 महीने और 16 दिन में एक बार सामने आती है
जब चंद्र और सौर गणना का अंतर इतना बढ़ जाता है कि उसे संतुलित करने के लिए एक पूरा अतिरिक्त मास जोड़ना आवश्यक हो जाता है।
लोक परंपरा में इसे मलमास भी कहा जाता है लेकिन शास्त्रीय दृष्टि से इसका उद्देश्य केवल काल-संतुलन बनाए रखना है।
शुक्ल और कृष्ण पक्ष की गणना में अधिक मास
प्रत्येक चंद्र मास दो भागों में विभाजित होता है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। तिथियों की पूरी व्यवस्था शुक्ल और कृष्ण पक्ष की गणना पर आधारित होती है।
अधिक मास में भी यही संरचना लागू रहती है। इसमें तिथियां पक्ष और व्रत-उपवास की गणना सामान्य चंद्र मास की तरह ही की जाती है अंतर केवल इतना होता है कि यह मास किसी संक्रांति से जुड़ा नहीं होता।
अधिक मास का कोई अलग नाम क्यों नहीं होता
सामान्य चंद्र मासों के नाम सूर्य की संक्रांति पर आधारित होते हैं जैसे चैत्र वैशाख या ज्येष्ठ। लेकिन अधिक मास के दौरान सूर्य कोई राशि परिवर्तन नहीं करता इसलिए इसे किसी नियमित मास का नाम नहीं दिया जाता।
धार्मिक परंपराओं में इस मास को भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष माना गया है। इसी कारण इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है हालांकि यह नाम धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा है न कि गणनात्मक आवश्यकता से।
हिंदू कैलेंडर में मास की क्षेत्रीय पद्धतियां
भारत के विभिन्न हिस्सों में अमांत और पूर्णिमांत जैसी अलग-अलग मास पद्धतियां प्रचलित हैं। इसी कारण कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि अधिक मास की स्थिति हर स्थान पर एक जैसी नहीं है।
वास्तव में यह अंतर हिंदू कैलेंडर में मास की क्षेत्रीय पद्धतियां अपनाने के कारण उत्पन्न होता है न कि गणना के मूल सिद्धांतों में किसी भिन्नता के कारण।
अधिक मास और हिंदू नववर्ष की गणना प्रणाली
भारत में हिंदू नववर्ष हर क्षेत्र में एक ही दिन क्यों नहीं मनाया जाता इसका संबंध भी चंद्र–सौर संतुलन से जुड़ा है। अधिक मास इस संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसी कारण हिंदू नववर्ष की गणना प्रणाली अलग-अलग पंचांग परंपराओं में भिन्न दिखाई देती है।
अधिक मास को अशुभ क्यों माना जाता है
धार्मिक दृष्टि से अधिक मास को सांसारिक भोग से हटकर आत्मिक साधना का काल माना गया है। परंपरागत मान्यता के अनुसार यह समय विवाह या नए भौतिक आरंभ के बजाय दान जप तप और भक्ति के लिए उपयुक्त माना जाता है।
यह दृष्टिकोण आस्था और परंपरा पर आधारित है न कि किसी वैज्ञानिक निषेध पर।
अधिक मास कोई अतिरिक्त या अनावश्यक महीना नहीं है बल्कि हिंदू कैलेंडर की खगोलीय और गणितीय समझ का व्यावहारिक समाधान है। यह चंद्र और सौर समय के बीच संतुलन बनाकर पर्वों ऋतुओं और धार्मिक अनुष्ठानों को उनके प्राकृतिक समय पर बनाए रखता है।
यह व्यवस्था दर्शाती है कि प्राचीन भारतीय कालगणना केवल धार्मिक नहीं बल्कि अत्यंत वैज्ञानिक और व्यवहारिक भी थी।
अस्वीकरण: यह लेख पारंपरिक पंचांग गणनाओं धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक व्याख्याओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं बल्कि विषय की जानकारी प्रस्तुत करना है।
First Published on: January 5, 2026 8:43 pm IST




