सोमवार को शिव पूजा क्यों की जाती है? इस पर सधगुरु जी ने क्या कहा

सोमवार को शिव पूजा की परंपरा कहां से आई? क्या यह केवल आस्था है या इसके पीछे चंद्रमा समय और मंदिरों से जुड़ा कोई गहरा संदर्भ है?

सोमवार को शिव पूजा क्यों की जाती है? इस पर सधगुरु जी ने क्या कहा

भारतीय धार्मिक जीवन में सोमवार एक जाना-पहचाना नाम है  शिव मंदिरों में यह दिन अपने आप खास हो जाता है  व्रत   जलाभिषेक   और एक सामान्य-सी धारणा कि यह “शिव का दिन” है  लेकिन Sadhguru Hindi यूट्यूब चैनल पर सामने आई यह बातचीत इस सहज मान्यता से आगे जाती है  यहाँ सवाल दिन की आस्था का नहीं   बल्कि उस समय व्यवस्था का है जिसके भीतर यह आस्था बनी  

करीब 6.78 मिलियन सब्सक्राइबर वाले इस चैनल पर सधगुरु यह संकेत देते हैं कि सोमवार को विशेष मानने की वजह आधुनिक सप्ताह प्रणाली नहीं   बल्कि एक पुरानी चंद्र आधारित समझ रही है   जिसे समय के साथ हमने लगभग भुला दिया  

बातचीत में एक महत्वपूर्ण ठहराव तब आता है   जब “सोम” शब्द को सिर्फ दिन के नाम के रूप में नहीं देखा जाता  यहाँ सोम को एक अवस्था के रूप में रखा जाता है   ऐसी अवस्था जिसमें व्यक्ति भीतर की ओर ढीला होता है   ग्रहणशील होता है  

इस संदर्भ में यह स्पष्ट किया जाता है कि सोम का अर्थ बाहरी नशे या उत्तेजना से नहीं है  यह उस स्थिति की ओर इशारा करता है जहाँ मन और शरीर एक अलग तरह की स्वीकृति और शांति में प्रवेश करते हैं  इसी वजह से शिव से जुड़े संदर्भों में सोम का बार-बार उल्लेख मिलता है  

संवाद का एक बड़ा हिस्सा उस समय व्यवस्था पर केंद्रित है   जिसके भीतर मंदिर बनाए जाते थे  यह कहा जाता है कि प्राचीन काल में मंदिर केवल पत्थर की इमारतें नहीं थे  वे ऐसे स्थान थे जिन्हें ग्रहों और चंद्रमा की गति को ध्यान में रखकर स्थापित किया जाता था  

विशेष रूप से शिव मंदिरों में   जहाँ शक्तिशाली लिंग की स्थापना होती थी   वहाँ कुछ प्रक्रियाएँ इसलिए रखी जाती थीं ताकि मानव शरीर स्वयं किसी तरह की बाधा न बने  विचार यह था कि यदि शरीर और आसपास की भौतिक संरचना सही तालमेल में न हो   तो वही साधना में रुकावट बन सकती है  

बातचीत में आधुनिक कैलेंडर व्यवस्था पर भी सीधी टिप्पणी आती है  जिस ग्रेगोरियन कैलेंडर को आज पूरी दुनिया मानक मानती है   उसे यहाँ ग्रह प्रणाली से कटा हुआ ढाँचा कहा जाता है  

महीनों की असमान लंबाई   सप्ताह का चंद्र गति से कोई सीधा संबंध न होना   और फिर भी इसे समय का अंतिम पैमाना मान लेना   यह सब उस पुरानी समझ से अलग दिखता है   जिसमें समय को आकाशीय गतिविधियों से जोड़कर देखा जाता था  

यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि केवल चंद्र मास का पालन किया जाता   तो सोमवार हर सातवें दिन एक जैसा नहीं आता  वह दिन चंद्र की स्थिति के अनुसार बदलता रहता  लेकिन जब उसी शब्दावली को दूसरी प्रणाली में डाल दिया गया   तो उसका मूल संदर्भ खो गया  

यह बातचीत केवल कैलेंडर की आलोचना नहीं है  इसके केंद्र में एक बड़ा विचार है   कि मानव शरीर और चेतना किसी बंद सिस्टम में काम नहीं करते  उन्हें ग्रहों   उपग्रहों और प्रकृति की गति से अलग नहीं किया जा सकता  

यहाँ जीवन को कुम्हार के चक्र के रूपक से जोड़ा जाता है  जैसे मिट्टी घूमते हुए आकार लेती है   वैसे ही मानव अस्तित्व भी बाहरी गतियों से प्रभावित होता है  यदि यह तालमेल समझ में न आए   तो वही शरीर और वही वातावरण जीवन में अड़चन बनने लगते हैं  

संवाद के अंतिम हिस्से में यह बात उभरकर आती है कि मंदिरों की प्राण प्रतिष्ठा को कभी स्थिर प्रक्रिया नहीं माना गया  यह एक ऐसा तंत्र था जो समय के साथ घटता-बढ़ता   बदलता और ग्रह स्थितियों के अनुसार काम करता था  

इसी वजह से चंद्र कैलेंडर में कभी बारह   कभी तेरह महीने आते हैं  यह असमानता अव्यवस्था नहीं   बल्कि प्राकृतिक संतुलन का संकेत मानी जाती थी  इसी संतुलन को ध्यान में रखकर साधना   उपासना और धार्मिक संरचनाएँ बनाई जाती थीं  

यह पूरी बातचीत सोमवार को किसी चमत्कारी दिन के रूप में स्थापित नहीं करती  इसके बजाय यह उस सोच की ओर इशारा करती है जहाँ समय   शरीर और चेतना एक-दूसरे से अलग नहीं हैं  

यह सवाल भी अप्रत्यक्ष रूप से उठता है कि जब समय को समझने का हमारा ढंग बदला   तो क्या हमारी धार्मिक अनुभूति भी सतही हो गई  सोमवार आज भी है   शिव मंदिर भी हैं   लेकिन शायद वह संदर्भ कहीं पीछे छूट गया है   जिसकी ओर यह बातचीत ध्यान खींचती है  

डिस्क्लेमर: यह लेख Sadhguru Hindi यूट्यूब चैनल पर प्रस्तुत संवाद में व्यक्त विचारों पर आधारित है। इसमें दी गई व्याख्या किसी धार्मिक सिद्धांत या वैज्ञानिक निष्कर्ष का दावा नहीं करती, बल्कि संवाद के प्रवाह को संपादकीय रूप में प्रस्तुत करती है



TOPICS Religion shivji

First Published on: December 22, 2025 12:04 pm IST

About the Author: Ritika Rawal

I am Ritika Rawal, a ground-level religious writer exploring Gods, Aarti traditions, Horoscope, Panchang and temple culture. I work closely with local pandits and experienced astrologers, bringing their real insights to readers. My focus is pure, authentic spiritual reporting that connects rituals with everyday faith.