Matsya Dwadashi 2025: जानें तिथि और समय, पूजा विधि और पौराणिक महत्व
भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार की स्मृति में मनाई जाने वाली Matsya Dwadashi इस वर्ष 2 दिसंबर 2025 को पड़ेगी। जानें व्रत तिथि, पूजा विधि और पौराणिक पृष्ठभूमि।

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाने वाला मत्स्य द्वादशी पर्व भगवान विष्णु के प्रथम अवतार की स्मृति को समर्पित है यह पर्व धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ सांस्कृतिक आस्था का भी हिस्सा बन चुका है जो हर वर्ष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है वर्ष 2025 में यह तिथि 2 दिसंबर मंगलवार को पड़ रही है
इस दिन भगवान विष्णु के मत्स्य रूप की पूजा कर भक्तगण ज्ञान धर्म और सुरक्षा की कामना करते हैं साथ ही व्रत दान और सत्कर्मों के माध्यम से आत्मिक शुद्धि और मोक्ष की दिशा में कदम बढ़ाते हैं
तिथि और मुहूर्त: 2024 बनाम 2025
Matsya Dwadashi 2024
मत्स्य द्वादशी 2024 में गुरुवार 12 दिसंबर को मनाई गई थी
- द्वादशी तिथि का आरंभ 12 दिसंबर को रात 1:09 बजे हुआ था
- तिथि का समापन 13 दिसंबर को सुबह 10:26 बजे हुआ
- (स्रोत: DrikPanchang.com – 2024 कैलेंडर)
Matsya Dwadashi 2025
इस बार मत्स्य द्वादशी मंगलवार 2 दिसंबर 2025 को पड़ी है
- द्वादशी तिथि आरंभ होगी: 1 दिसंबर 2025 को शाम 7:01 बजे से
- समाप्ति होगी: 2 दिसंबर 2025 को दोपहर 3:57 बजे तक
- पारणा (व्रत खोलने) का समय: 3 दिसंबर 2025 सुबह 6:58 से 9:03 बजे तक
- (स्रोत: DrikPanchang.com – 2025 कैलेंडर)
ध्यान रहे कि पंचांग और मुहूर्त स्थान-विशेष के अनुसार भिन्न हो सकते हैं इसलिए स्थानीय कैलेंडर से पुष्टि करना उचित रहेगा
Matsya Avatar Ki Katha: मत्स्य अवतार की पौराणिक कथा
हिंदू धर्म में वर्णित दशावतारों में पहला अवतार ‘मत्स्य’ का माना जाता है जब सृष्टि के आरंभिक काल में हयग्रीव नामक असुर ने ब्रह्मा जी से वेदों की चोरी की और उन्हें सागर में छिपा दिया तब संसार अंधकार और अज्ञानता में डूब गया
इस स्थिति में भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण किया समुद्र से उभरते हुए वे राजा मनु के पास पहुंचे और उन्हें चेताया कि शीघ्र ही प्रलय आने वाला है उन्होंने मनु को एक विशेष नाव बनवाने को कहा और उस नाव में सप्त ऋषियों वनस्पतियों के बीजों प्राणियों और आवश्यक तत्वों को सुरक्षित रखने की आज्ञा दी
प्रलय के समय भगवान विष्णु ने उस नाव को अपनी पीठ पर रखकर सुरक्षित मार्ग दिलाया और प्रलय के उपरांत वेदों को पुनः स्थापित कर ब्रह्मा को सौंपा यह कथा विष्णु पुराण मत्स्य पुराण और महाभारत में विस्तार से वर्णित है
पूजा विधि: कैसे करें मत्स्य द्वादशी का पूजन
मत्स्य द्वादशी की पूजा विधि पारंपरिक है लेकिन घर पर भी इसे सरलता से किया जा सकता है
- प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें
- पूजा स्थल पर पीले वस्त्र से ढकी चौकी पर भगवान विष्णु या मत्स्य अवतार की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें
- दीपक धूप चंदन अक्षत पीले पुष्प तुलसी पत्र फल और मिठाई से पूजन करें
- “ॐ मत्स्यरूपाय नमः” मंत्र का जप करें या विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें
- श्रद्धा अनुसार दिनभर व्रत रखें फलाहार या एक समय सात्विक भोजन का नियम अपनाएं
- शाम को पूजा के पश्चात ब्राह्मण भोज वस्त्रदान जलदान या अन्नदान करना पुण्यकारी माना जाता है
धर्म में महत्व और सांस्कृतिक संदर्भ
मत्स्य द्वादशी न केवल विष्णु उपासना का पर्व है बल्कि यह जल जीवन ज्ञान रक्षा और पर्यावरण संतुलन का भी प्रतीक है
- यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जब संसार अज्ञान के सागर में डूब जाए तो किसी ना किसी रूप में ‘धर्म’ स्वयं सामने आता है
- इस दिन मछलियों को आटा या चावल के गोले बनाकर जल में डालना केवल प्रतीकात्मक कर्म नहीं बल्कि पर्यावरण के प्रति जागरूकता का भी संकेत है
- परिवारों में इस दिन बच्चों को मत्स्य अवतार की कथा सुनाना प्रकृति के प्रति संवेदना जगाना और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देना भी इस पर्व का उद्देश्य है
मत्स्य द्वादशी 2025 केवल एक व्रत या तिथि नहीं बल्कि यह स्मरण का वह बिंदु है जो धर्म चेतना और सृष्टि की रक्षा के लिए हमारे भीतर नई जिम्मेदारी जगाता है
जब जीवन की नाव डगमगाने लगे तो यह पर्व याद दिलाता है कि दिशा देने वाला कोई ना कोई मत्स्य अवतार सदा साथ होता है चाहे वह किसी देव रूप में हो किसी अनुभव में या आत्मा की पुकार में
डिस्क्लेमर:
इस लेख में प्रस्तुत जानकारी धार्मिक ग्रंथों परंपराओं और व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है hinduifestival.com किसी भी धार्मिक क्रिया या फल की गारंटी नहीं देता कृपया किसी विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें
First Published on: November 21, 2025 6:37 pm IST




